Nindak Niyre Rakhiye By Monika Manthan
निंदक नियरे रखिये
द्वारा : मोनिका मंथन
प्रकाशक : मंथन प्रकाशन, जयपुर
शीर्षक :-
'निंदक नियरे रखिये' पुस्तकों
की समीक्षा एवं चंद वरिष्ठ रचनाकारों की उनकी कृतियों पर आधारित विवेचना है ।
किन्तु शीर्षक से प्रतीत होता है मानो पुस्तक में ऋणात्मक टिप्पणियों, निंदा, एवं पुस्तकों
के तमाम तरह के दोषों का संग्रह होगा। शीर्षक की उपादेयता पर विमर्श के पूर्व
विवेचना एवं निंदा पर लघु चर्चा अपरिहार्य
है ।
किसी विषय के सभी पक्षों को तौलकर एवं तथ्य और वास्तविकता को ध्यान में रखते हुए विचार करने की प्रक्रिया को विवेचना कहा जाता है। सत्य और असत्य का विचार, तर्क-वितर्क, मीमांसा, अनुसंधान एवं परीक्षण विवेचना के मुख्य अंग हैं।
आलोचना, किसी भी व्यक्ति या वस्तु की बिना किसी
पूर्वाग्रह के निष्पक्ष भाव से की गई समीक्षा को कहते हैं। इसमें व्यक्ति विशेष या
वस्तु विशेष के गुण और दोषों की समभाव से विवेचना की जाती है। इसके विपरीत निंदा
पूर्वाग्रह , दुर्भाव
अथवा मतान्तर से प्रेरित अवगुणों और केवल
अवगुणों का बखान होता है। जब निष्पक्ष भाव से गुण दोष कहे जाते हैं तो वह आलोचना होती है तथा आलोचना
सदैव तथ्य परक होती है जबकि निंदा में तो मात्र बुराई ही है । निंदा में गुण दोष से ऊपर ईर्ष्या एवं द्वेष की भावना
अंतर्निहित होती है। उक्त विचरण के पश्चात शीर्षक संग अंतर्वस्तु का मेल होता प्रतीत नहीं होता अतः शीर्षक
की युक्तियुक्त्ता की पुष्ठी नहीं होती।
रचनाकार:-
मोनिका मंथन जी का यह प्रथम प्रयास है । पूर्व
में पत्रिकाओं में विभिन्न विषयों पर आलेख प्रकाशित हुए हैं। भारत रत्न डॉक्टर
भीमराव आंबेडकर , भारत के पर्व और त्यौहार उनकी प्रकाशित कृतियाँ हैं।
पुस्तक :-
पुस्तक निंदक नियरे रखिये मूलतः दो भागों में
है। जहां पहला
भाग विवेचना का है व विभिन्न रचनाओं के विस्तृत अध्ययन पर
आधरित है। वही दूसरे भाग में चंद पुस्तकों की समीक्षा
प्रस्तुत की गई है ।
विवेचना खंड का प्रारंभ
“मुस्लिम कवियों के
नायक : राम”
आलोच्य खंड में लेखिका यह प्रमाणित करने में सफल
रही है कि प्राचीन काव्य में साम्प्रदायिक कट्टरता
का अभाव है या तो वह अनुपस्थित ही है आराध्य का गुण अधिक है एवं धर्मिक दृष्टिकोण को स्थान नही है। रचनाकारों का एक व्यापक
दृष्टिकोण देखने को मिलता है। फिर वह फ़ारसी कवि शेख सादी
द्वारा रचित “दास्तान ए राम व सीता” शीर्षक से लिखी राम कथा ही या तो शाहजहां के
काल में रचित रामायण फ़ैज़ी । वही तुलसी के राम पर अमीर खुसरो ने कहा है कि
“तन मन धन का वह है मालिक
वासे निकसे जी को काम
वो हम सब का मालिक राम” ।
वही तुलसी के समकालीन रहीम ने भी रामचरित गुणगान
करते हुए कहा है कि
रामचरित मानस विमल , संतन
जीवन प्राण ।
हिन्दुआन को वेद सम, यवनहीं प्रकट कुरान । ।
अनेकोनेक साहित्यिक रचनाओं को उद्धृत कर यह
प्रमाणित करने में कामयाब रही हैं कि मुस्लिम कवियों ने भी राम पर बहुत गुणगान
किया।
“साझी विरासत का प्रतीक मुस्लिम कवियों का कृष्ण प्रेम”
जहाँ राम
भक्ति है श्रद्धा है
वही कृष्ण प्रेम है , कवि प्रेमी पहले है भक्त बाद में, इसी
लिए कृष्ण के मुस्लिम प्रेमी कवियों की संख्या भी कम नहीं है, फिर वह खुसरो का काल
हो या सईद सुल्तान, जिन्होंने कृष्ण को
नबी का दर्जा दिया या फिर अली रज़ा जिन्होंने राधा कृष्ण के प्रेम पर खूब लिखा।
वहीं सुल्तान नज़ीर शाह एवं सुल्तान हुसैन शाह जो इन ग्रंथों से इतने प्रभावित हुए
की उन्होंने तो भागवत पुराण और महाभारत के
बांग्ला अनुवाद भी करवा दिए। खुसरो की
कृष्ण भक्ति तो जगजाहिर है। उनकी रचना “छाप तिलक सब छीनी..”को कैसे विस्मृत किया
जा सकता है। सूफीवाद , जिसमें रहस्य वाद प्रमुख था, संसारिक प्रेम और आध्यात्मिक
प्रेम का संगम, उस सूफी काल में बहुत से कृष्ण प्रेमी कवि
हुए जिनमें रसखान (सईद इब्राहिम ) तो प्रमुख थे ही
रहीम, आलम शेख नज़ीर अकबराबादी का नाम भी प्रमुखता से लिया जाता है। चैतन्य महाप्रभु के मुस्लिम
अनुयायिओं की भी काफी तादाद रही है ।
विवेचना हेतु अगली पुस्तक
जयशंकर प्रसाद जी की
कामायनी
“प्रसाद की काव्य रचना और “कामायनी” का यथार्थ”
प्रसाद की काव्य रचनाओं का विवेचन करते हुए
उन्होंने प्रसाद को प्रेम और सौंदर्य का कवि पाया। जब भी प्रसाद का वर्णन होगा
उनकी अद्वितीय रचना कामायनी स्वतः सम्मुख आ खड़ी होती है । जिसके मुख्य पात्र मनु, इच्छा
श्रद्धा इत्यादि थे जो कि ज्ञान के प्रतिनिधि हैं। इस महाकाव्य में प्रसाद ने ऐसे
युग की कल्पना की है जहां भौतिकता और बौधिकता नहीं श्रद्धा और संयम ही आनंद का आधार है।
ईर्ष्या नहीं शांति है। कामायनी , समकालीन चुनौतियों के समाधान इस कृति में यत्र तत्र
विद्यमान है, जो कि न केवल सामयिक
संदर्भों में जपगोगी है अपितु भविष्य हेतु दिशा सूचक भी है । विचारों की दृष्टि से
परिपूर्ण, भावात्मकता से ओत प्रोत तथा जीवन में इच्छा ज्ञान
और क्रिया के समन्वय की आवश्यकता बताते हुए इस ग्रंथ को भाव विचार एवं शैली की
दृष्टि से भी अत्युत्तम रचना पाया है।
रामधारी सिंग दिनकर की उर्वशी
उन्मुक्त कामनाओं की दास्ताँ ही नहीं है: उर्वशी :-
एक महान काव्य एवं रामधारी सिंह जी की पहचान है
उर्वशी। विवेचना करते हुए जहां उन्होंने दिनकर जी की शैली, अलौकिक
प्रेम की अभिव्यक्ति, नारी सौंदर्य के प्रति कवि के विशेष
लगाव इत्यादि को रेखांकित किया है वहीं उनके लेखन पर मुक्तिबोध की टिप्पणी भी
मायने रखती है, जिसे उल्लिखित किया गया है कि “उसमें एक दुर्निवार कामुक अहम ने
अस्वाभाविक ढंग से आध्यात्मिक मुकुट पहनने
की कोशिश की है, तथा कवि ने काम-संवेदनात्मक कल्पना का ऐसा अहेतुक आडंबर खड़ा किया
है, जिससे पाठकों के मन में अध्यात्म का भ्रम उत्त्पन्न हो सके। मुक्तिबोद्ध कि
दृष्टि आलोचक की दृष्टि है। उन्होंने कामायनी व उर्वशी दोनों पर ही विचार दिए है।
उनकी दृष्टि में उर्वशी का कामध्यत्मवाद समुत्तेजित लगता है स्वाभाविक नहीं.
दिनकर ने स्वयं ही कहा है कि उर्वशी किसी निर्णय पर पहुचने के लिए नहीं, अपितु प्रेम
की अटल गहराइयों का अनुसंधान करने के लिए लिखी गयी है।
अंत में विवेचन पश्चात वे इस निष्कर्ष पर पहुचती
है, कि
दिनकर ने प्रेम के विभिन्न रूपों की तुलनात्मक व्याख्या प्रस्तुत करते हुए उर्वशी में चित्रित यौन समस्याओं या काम प्रेम की
समस्याओं का समाधान च्यवन एवं सुकन्या के संतुलित दाम्पत्य के रूप में प्रस्तुत
किया गया है।
कवियत्री महादेवी वर्मा जी
“महादेवी के काव्य में विरह की पड़ताल” :-
आधुनिक युग की कवियत्रियों में सर्वप्रमुख महादेवी जी जिनकी गढ़ना छायावाद के चार प्रमुख स्तंभों में की जाती है, के काव्य की वेदना युक्त विशिष्ट शैली सदैव ही एक दुर्बोध विषय रहा है। उनके काव्य में विरह वेदना की प्रस्तुति अभिन्न है, व उनकी काव्य की पीड़ा को मीरा की काव्य पीड़ा से भी बढ़ कर माना गया है। विरह की सात्विकता उनके काव्य में है व विरह जन्य व्याकुलता के साथ संयोग की इक्षा भी। महादेवी जी का वेदना भाव मधुमय पीढ़ा का भाव है। साथ ही घनानंद ,प्रसाद ,व गालिब और मीर के भी प्रेम और वेदना के कुछ अंश को दर्शा दिया है। उनके शब्दों में महादेवी की पीड़ा हृदय की शांत और गंभीर पीड़ा है।
उन्होंने वेदना, करुणा, दुख, तथा विरह को अभिव्यक्त किया है व परमार्थ और परहित को महत्व दिया है। उनकी वेदना का आधार नारी का कोमल हृदय है जो बार बार अपने प्रियतम को पाने का प्रयत्न तो करती है किंतु विफल होती है। विभिन्न दृष्टांतों एवं उद्धवरण से यह भी प्रमाणित होता है कि विवेचना लेखन हेतु गंभीर सोच एवं गहन अनुसंधान किया गया है।
साहित्य में मुस्लिम स्त्री विमर्श पर केंद्रित है विवेचना
की अगली कड़ी
“साहित्य के आईने में मुस्लिम स्त्री”:-
प्राचीन काल में साहित्य में मुस्लिम स्त्री के
अस्तित्त्व को परखा गया है वहीं अंग्रेजी शासन काल , देश विभाजन काल एवं उसके बाद की
परिवर्तित परिस्थितियों से समकालीन
साहित्य तक का गहन अध्ययन प्रस्तुत किया है एवं विभिन्न पुस्तकों से उद्धरण देते
हुए तथा स्थापित साहित्यकारों की रचनाओं पर प्रकाश डालते
हुए इस निष्कर्ष पर पहुची हैं कि दोनों ही भाषाओं के सरोकार एक से हैं और अपने
कार्य व्यवहार द्वारा स्त्री चेतना को परिभाषित करते हुए हिंदी एवं उर्दू साहित्य
दोनों ही अपनी भूमिका बखूबी निभा रहे हैं ।
समीक्षा खंड:-
पुस्तक का अगला खंड समीक्षा खंड है । समीक्षा से अभिप्राय है सं और ईक्षा। अर्थात सम्यक ईक्षण करना। इसका अभिप्राय है कि समीक्षा किसी को परीक्षा की कसौटी में कसकर निकालने की प्रक्रिया का नाम है। जिससे हम एक ऐसे ठोस निष्कर्ष या परिणाम पर पहुंचते हैं जिसका लाभ समाज को और संसार को मिल सकता है। यह सम्यक ईक्षण है। विचार पूर्वक ईक्षण कर निष्कर्ष पर पहुंचने की एक प्रक्रिया।
समीक्षा
में समीक्षक अपना पूर्णतया तटस्थ भाव रखता
है । ना तो वह किसी के गुणों से आकर्षित होकर अपनी समीक्षण शक्ति को भटकाता है और
ना ही किसी अवगुण से प्रेरित होकर अपनी विचार शक्ति को भटकने देता है।
आलोचना, निंदा, समीक्षा भी ऐसे ही शब्द हैं, जिन्हें हमें यथा स्थान
प्रयुक्त करना चाहिए।
प्रस्तुत समीक्षा खंड में मोनिका जी ने कुछ पुस्तकों की समीक्षा प्रस्तुत
की है कुछ पुस्तकें तो हालिया प्रकाशित ही है , इस विषय में मेरा निवेदन है की जहाँ
एक विदुषी लेखिका द्वारा पुस्तक समीक्षा प्रस्तुत करी गयी हो उस के पश्चात उस
समीक्षा की समीक्षा करना मेरी अल्प समझ के
अनुसार या तो स्वयं को बेहतर समझ उन के
कार्य का मूल्त्यांकन करना है अथवा उन के कार्य को क़मतर आंकना एवं उनके गुण दोष का
निर्धारण करना है . उक्त दौनों ही कारण उनके द्वारा की गयी समीक्षाओं की समीक्षा
लिखने से मुझे रोक देते हैं साथ ही यह कि ऐसा करना निश्चय ही किसी भी साहित्यकार की शान
में गुस्ताखी होगा ।
उनके द्वारा लिखी गयी सभी समीक्षाएं मैंने बहुत गहराई से डूब कर पढ़ीं व यह बात विशिष्ठ उल्लेख के साथ कहना चाहूँगा की रचनाओं का शीर्षक एवं समीक्षा की प्रस्तुति आकर्षक है। आकर्षक भाषा शैली में पाठकों में पुस्तक पढने हेतु उत्सुकता जागृत करने में कामयाब हुयी हैं । बात चाहे रमेश खत्री जी द्वारा रचित”इस मोड़ से आगे” की हो या फिर निबंध संग्रह “हमारी चिंतन धारा” की या फिर १९ कहानीकारों की प्रेम कहानियों का संकलन “ जयपुर प्रीत की बाँहों में’ या फिर ‘नदी बहती रही”। सभी पुस्तकों की समीक्षा में पुस्तकों के साथ पूरा पूरा निष्पक्ष दृष्टिकोण रखते हुए व समीक्षा के समस्त आवश्यक तत्वों का समावेश करते हुए सुन्दर समीक्षाएं प्रस्तुत की गयी हैं।
सविनय
अतुल्य





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